पहचान
मुझे जिम्मेंदारीयों की जंजीरों मे ना बांधो।
हाँ मेरे बाल कुछ सफेद हो गए हैं।
कुछ महीन लकीरों ने मेरे
चेहरे पर जगह ले ली है।
नजर का चश्मा लगाती हूँ।
तो देख रही हू
हर जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है हमने।
हर रिश्ते को शिद्दत से जिया है।
उम्र के इस पडाव पर
अब खुद के लिए जीना चाहती हूं।
खुद से,
अपनी इच्छाओं से,
अपनी अधूरे ख्वाहिशों में
रंग भरना चाहती हूँ।
उम्र के जंजीरों को काटकर
एक नया आयाम लिखना चाहती हूँ।
मैं आजाद होना चाहती हूँ
हर कोसलो से
कुरीतियों से
बंधनों से,
मैं खुली हवा में सांस लेना
चाहती हूँ।
एक बार फिर से
माँ का आँचल पकड़कर
मासुमियत को जीना चाहती हूँ।
नंगे पाँव बारिश में भींगकर,
कागज की नाव चलाना
चाहती हूँ।
दुनियादारी इस तरह
निभाई हमने की
खुद का वजूद ही भूल गये|
एक बार फिर से
खुद की पहिचान बनाना
चालती हू मैं|

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